सफर शुरू होता है एक अनजाने अनसुलझे रहष्य से

 ये सफर शुरू होता है एक अनजाने अनसुलझे रहष्य से। जहा से हम शुरुआत करेंगे वो अंत भी हो सकता है और प्रांरभ भी। 

मेरे पास न कोई रास्ता है , न कोई मंजिल। ये सफर ही तय करेगा की कहाँ जाना है।  यह कोई लॉजिक काम नहीं करेगा और न ही कोई तर्क। फिर भी हर जगह लॉजिक  और तर्को का सहारा लिया जायेगा। 

मेरे पास कोई रास्ता नहीं है तो शुरुआत में भटक जाना ही जरूरी है।  जब हमारे पास रास्ता नहीं होता तो बस झोला उठाकर चल देना ही काफी होता है। 

आओ चलते है भटकने के लिए। उस रहश्य का पता करने जो मेरे मन को अशांत किये रहता है।  जो बार बार मुझे कहता है की यही तेरी मंजिल है। 

ये मेरा वहम है या कुछ और पता नहीं।  पर जो भी है बहुत अजीब है। कोई इसे समझ नहीं सकता। मै खुद भी नहीं। ये कोई कहानी नहीं होने जा रही है , न ही हम इसे इस तरह लिखेंगे।  ये रिलिजन के हर पहलू को जानने की कोशिस  करेगी। क्यों एक इंसान को धर्म की जरूरत है और है भी तो क्या इतनी की वो इसके लिए दूसरे इंसान को मार सकता है। 

आज भी मई इसे लिखना शुरू नहीं करता अगर आफ्टर लाइफ के बारे में डिस्कवरी पर नया सीरियल नहीं देखता।  उससे एक बात तो सभी धर्मो में सामान लगी कि सभी मानते है की आत्मा होती है। कोई उसे रूह कहता है कोई स्पिरिट। सबको यकीन है की मरने के बाद इंसानो को किसी न किसी जगह जाना है जिसे स्वर्ग हेवन जन्नत या नर्क हेलल जहनुम कहते है। 

अगर सबकी शुरुआत और अंत में एक जैसा है तो सब धर्म इतने अलग अलग होने का नाटक क्यों करते है। क्या इनके खुदा गॉड भगवान उप्पर या जहा कही भी होंगे या है वो अलग अलग सबको कंट्रोल करते है। वो धरती पर काम खत्म होने के बाद ले जाते है। 

मेरे पास इस सफर की शुरुआत में कुछ भी नहीं है। न कोई तत्य न कोई दिव्या शक्ति न कोई औचित्य। मै अपने धर्म जिसका पिछले ३४ सालो से अनुसरण कर रहा हूँ। उसको भी त्याग कर बिलकुल निष्पक्ष होकर इसको लिखना चाहता हूँ। 

मै किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रह से विमुक्त होकर इसे करना चाहता हूँ। कि मै अपनी आने वाली पीढ़ियों को इस रहष्यमयी दुनिया के पहलू को समझने का मौका मिले। वो इसे जान सके एक खुले मन से सोच  सके। वो सही में जान सके की असल में भगवान रब गॉड आल्हा खुदा वगैरह कुछ होता भी है या नहीं। या ये मात्र एक राजनितिक षड़यत्र है जो पिछले 1 लाख सालो से चल रहा है ताकि ०.१ % लोग ९९.९ % लोगो पर अपना अधिपत्य स्थापित रख सके। क्युकी अगर ये सब है तो दूसरे जानवरो और पेड़ पौधो के लिए भी उनका उतना ही महत्त्व होना चाहिए आखिर दिमाग उनमे भी होगा चाहे हमसे सो गुना छोटा ही क्यों न हो। 

तो फिर वो भक्ति प्रेयर नवाज नहीं करते। उनमे भी वही आत्मा रूह स्पिरिट होनी चाहिए जो हममे है। या उनका भी कोई धर्म होता है। उनका भी अपना कोई भगवान गॉड अल्लाह होता होगा जिसकी वो अपने ढंग से भक्ति प्रेयर नवाज करते होंगे। 

इस सफर की शुरआत में भटक जाते है और जो आज टीवी पर देखा उसी से इसकी शुरुआत करते है। 


मौत के बाद जिंदगी 

विज्ञानं कहता है कि ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती। वो एक रूप से दूसरे रूप में परवर्तित की जा सकती है पर नष्ट नहीं की जा सकती है। हम भी तो ऊर्जा का एक रूप ही तो है। क्या मरने के बाद हमारी ऊर्जा दूसरी किसी ऊर्जा में परवर्तित हो जाती है या नष्ट हो जाती है। हम ही क्यों है हर जीवित या अजीवित वस्तु एक ऊर्जा का ही एक रूप है। वो किसी न किसी रूप में या तो परवर्तित होते होंगे या नष्ट हो जाते होंगे। 

अगर परवर्तित होते होंगे तो विज्ञानं का यह नियम सत्य है। नहीं तो यह असत्य है। 

ऊर्जा को ही अगर हम आत्मा स्पिरिट रूह मान लेते है तो वो किसी न किसी रूप में परवर्तित होती होगी। जानवरो और पेड़ पोधो  की बात तो छोड़ो अगर हम इंसानो की ही बात करते है तो चाहे हम काले है गोरे है गेहुंवे है या किसी भी रंग रूप शारीरिक संरचना , यहाँ तक की किसी भी धर्म के है हम सबमे में ऊर्जा का एक ही प्रकार है।  तो हमारी ऊर्जा का परिवर्तन भी एक जैसा ही होता होगा। तो अगर मौत के बाद कुछ होता होगा तो वो भी एक जैसा ही होता होगा। 

मेरा दिमाग ऐसे लिखते हुए पूरी तरह सैचुरेटेड हो गया है क्योकि न मुझे इन सब सवालों के जवाब पता है और न ही मेरा दिमाग इन सबको ढूंढ पा रहा है। 

मैंने पहले ही कहा था की हम भटकने जा रहे है।  और भटकना इसे ही कहते है आप  थोड़ी दूर चलो और आपका मन करे की आपको रास्ता तो पता ही नहीं है। आप आगे कहां जाओगे। बस थोड़ी देर के लिए रुक कर या तो वापिस मुड़ जाओगे या सफर पर आगे चल दोगे पर सफर तो असंजस में ही तह करना पड़ेगा। 

बहुत लोगो की भावनाये आहत होगी बहुत लोगो को बुरा भी लग सकता है पर किसी न किसी को तो यह सफर शुरू करना ही पड़ेगा  

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